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Monday, 18 May 2020

अब तो मान जा

मनुष्य सदैव नवीन खोज की चाहत लिए के लिए हुए प्रयासरत हैं। इसे कहीं निराशा तो कहीं घोर  त्रासदी  का सामना करना पड़ा है ।फिर भी यह समझता नहीं है। इसके महत्वाकांक्षा ने हर 100 साल में समाज को काल का ग्रास बनाया है। प्रथम विश्वयुद्ध इसकी अटल मिसाल है जहां से शुरू हुआ स्पेनिश फ्लू। जो धुरी राष्ट्र एवं मित्र राष्ट्रों के आपसी मतभेद का परिणाम था। युद्ध से वापस अपने घरों को लौटने वाले सिपाहियों ने इसे संपूर्ण विश्व में फैलाने के लिए वाहक का कार्य किया । स्पेनिश फ्लू को सबसे पहले प्रथम विश्व युद्ध से माना जाता है। इसे 1918 फ्लू भी कहते हैं । इस फ्लू का कारण h1n1 इनफ्लुएंजा वायरस था। इसने लगभग 15 महीने की समय अंतराल में विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 34% लोगों को अपने संक्रमण में ले लिया था। इसके पहले भी 16,17,18 वीं तथा 19 वी सदी में मलेरिया ,पोलियो, प्लेग, हैजा इत्यादि नामों से प्रकृति ने मानव को संदेश भेजा कि मान जा मानव ,रोक दे अपने आक्रामक महत्वाकांक्षी अभियान को । मगर इसमें नहीं माना । मानव सभ्यता अपनी प्रकृति एवं आर्थिक जीवन व आवश्यकताओं की आड़ में   प्रकृति का सदैव से अंधाधुंध दोहन किया है कि इसकी भरपाई संभव नहीं है । जिस संस्कृति परंपरा एवं समाज के लिए इसने अपना वर्चस्व कायम किया -आज दंड स्वरूप उसे ही नष्ट करने के लिए मजबूर खड़ा है इंसान । इस वैश्विक महामारी ने हमें अपनों से दूर रहने ,किसी प्रकार की वस्तु का आदान-प्रदान आदि से तौबा करने को मजबूर कर दिया है । यही नहीं इंसान अपनी मानसिकता को बदलने पर मजबूर हो रहा है। जिसमें इसकी सोच एवं मानसिक स्तर दोनों अपने-अपने स्तर से नीचे गिर चुके होंगे । जहां वर्तमान लूटपाट चोरी जैसी  कुकर्मों से समाज व्याप्त था ,परेशान था ,वही अपनी चीजो को भी छूने का साहस नहीं छोड़ा । मानव इतना डरा सहमा सा है कि अपने ही चेहरे को हाथ लगाने में डर लगता है । 
फिलहाल अभी यह मान लेना कि यह अंतिम चेतावनी थी -सब कुछ ठीक हो जाएगा -यह गलत होगा क्योंकि अति शीघ्र हम कुछ भयानक त्रासदीओं से रूबरू होने वाले हैं जिनमें ग्लोबल वार्मिंग ,जल संकट एवं खाद्य समस्या एक विकट रूप लिए दरवाजा खटखटाने को बेताब है। 

Saturday, 11 January 2020

आखिर कब तक

धरती माता यह वर दो 
मैं भी चलना  चाहूंगा
पैर नहीं फिर भी त
लंगड़े जैसे चलना चाहूंगा
नैन नहीं मेरे तन में लेकिन
दिनकर गति को जानूगा
धरती माता यह वर दो
मैं भी चलना चाहूंगा
वाणी नहीं,  गुंगा हु
सदियों से खड़ा अकेला हूं
दीवार बनुना ना राह किसी के
फिर भी काटा जाता हूं 
इनसे बचने के माफिक
में दौड़ लगाना चाहूंगा

धरती माता.............
पैर मगर काम   नही
उनसे भोजन करता हु
हाथ, मगर  निष्काम है
सो राही को छाया देता हु
जग कि या रीती  गजब की, सदियों से देखे जाता हु
जितने सीधा खड़ा रहु
उतनी जल्दी काटा जाता हु
इनसे बचने के माफित 
मैं दौड़ लगाना चाहूंगा। ।

Sunday, 21 July 2019

मेरी माँ

माई रे सुना दे सुंदर लोरियां
मै सो जाऊ तेरी गोदियाँ
सारा जग घूम के देखा,
नहीं तोरे ह्रदय विचित्र सरेखा
सुब्बुद्दी है खोई देखि जग रीती
अशुध  सी सोइ पा  अंचल कि छइया
माई रे सुना दे.........
एक से मानुष तन मै पावा
दूजी से बन गई  काया
एक ललाट अमर  तिलक लगावे
दूजी लहू किया बोली लगावे
माई रे सुना दे सुन्दर लोरिया
मै सो जाऊ तेरी गोदिया l