धरती माता यह वर दो
मैं भी चलना चाहूंगा
पैर नहीं फिर भी त
लंगड़े जैसे चलना चाहूंगा
नैन नहीं मेरे तन में लेकिन
दिनकर गति को जानूगा
धरती माता यह वर दो
मैं भी चलना चाहूंगा
वाणी नहीं, गुंगा हु
सदियों से खड़ा अकेला हूं
दीवार बनुना ना राह किसी के
फिर भी काटा जाता हूं
इनसे बचने के माफिक
में दौड़ लगाना चाहूंगा
धरती माता.............
पैर मगर काम नही
उनसे भोजन करता हु
मैं भी चलना चाहूंगा
पैर नहीं फिर भी त
लंगड़े जैसे चलना चाहूंगा
नैन नहीं मेरे तन में लेकिन
दिनकर गति को जानूगा
धरती माता यह वर दो
मैं भी चलना चाहूंगा
वाणी नहीं, गुंगा हु
सदियों से खड़ा अकेला हूं
दीवार बनुना ना राह किसी के
फिर भी काटा जाता हूं
इनसे बचने के माफिक
में दौड़ लगाना चाहूंगा
धरती माता.............
पैर मगर काम नही
उनसे भोजन करता हु
हाथ, मगर निष्काम है
सो राही को छाया देता हु
जग कि या रीती गजब की, सदियों से देखे जाता हु
जितने सीधा खड़ा रहु
उतनी जल्दी काटा जाता हु
इनसे बचने के माफित
सो राही को छाया देता हु
जग कि या रीती गजब की, सदियों से देखे जाता हु
जितने सीधा खड़ा रहु
उतनी जल्दी काटा जाता हु
इनसे बचने के माफित
मैं दौड़ लगाना चाहूंगा। ।
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